Lekhika Ranchi

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रविंद्रनाथ टैगोर की रचनाएंःअवगंठुन 3



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पाठक इस कथा को कोरी कवि-कल्पना ही न समझें। जिन दिनों यहां सती की प्रथा प्रचलित थी, उन्हीं दिनों ऐसी घटनाएं कभी-कभी हो जाया करती थीं।
महामाया के हाथ-पैर बांधकर यथासमय चिता में रखकर उसमें आग लगा दी गई थी। आग भी खूब जोरों से जल उठी थी। लेकिन उसी समय बहुत जोर का बवंडर उठा और मूसलाधर वर्षा पड़ने लगी। जो दाह-संस्कार करने आये थे वे शीघ्रता से 'गंगायात्री' वाली कोठरी में जा छिपे और भीतर से द्वार बन्द कर लिया। सभी समझते हैं कि ऐसे आंधी पानी में चिता बुझते समय नहीं लगता। इसी बीच में उसके हाथों में बंधा कपड़ा जलकर भस्म हो गया और हाथ खुल गये। असह्य दाह-पीड़ा में मुख से वह कुछ कह न सकी, तुरन्त उठकर बैठ गई और पैर की रस्सी खोल डाली। उसके बाद कई स्थानों से जली हुई साड़ी से देह को छिपाये हुए लगभग नंगी-सी चिता से उठकर पहले वह अपने घर आई। घर में कोई था नहीं? सब श्मशान में थे। दीपक जलाकर एक धोती पहनकर महामाया ने एक बार दर्पण में अपना चेहरा देखा और दर्पण जमीन पर दे पटका। फिर कुछ देर खड़ी-खड़ी सोचती रही। उसके बाद चेहरे पर लम्बा अवगुंठन किया और राजीव के घर की ओर चल दी। इसके बाद जो कुछ हुआ, सो पाठकों को मालूम ही है।
महामाया अब राजीव के पास ही रहती है; लेकिन राजीव के जीवन में सुख-शान्ति नहीं, दोनों के बीच, केवल अवगुंठन का व्यवधान है।
लेकिन वह अवगुंठन मौत के समान चिर-स्थायी नहीं, अपितु मृत्यु से भी बढ़कर पीड़ा उत्पादक है। इसलिए कि निराशा मृत्यु की विरह पीड़ा को धीरे-धीरे अचिंतन रूप प्रदान कर देती है; किन्तु इस अवगुंठन के पृथक रूप ने एक जीती-जागती आशा को प्रतिदिन प्रतिपल व्यथित एवं पीड़ित कर रखा है।
एक तो पहले ही महामाया की शान्त प्रकृति है, उस पर उसके इस अवगुंठन के भीतर नीरवता दुगुनी असह्य-सी प्रतीत होने लगी। राजीव अब ऐसे रहने लगा, जैसे उसे मृत्यु की चलती-फिरती पुतली ने घेर लिया हो। वह पुतली उसके जीवन को आलिंगन करके नित्यप्रति उसे क्षीण करती जा रही है। राजीव पहले जिस महामाया नाम से परिचित था उसे तो उसने खो दिया। अब तो वह केवल उसकी सुन्दर बाल्य-स्मृति पर ही जीवन को अवलम्बित करके इस दुनिया में रह सकता है, परन्तु उसमें भी अवगुंठन युक्त पुतली सदैव उसके पार्श्व में रहकर बाधा पहुंचाती रहती है। वह सोचता है, इंसान में स्वभाव से ही काफी अन्तर है और खास कर महामाया तो महाभारत के कर्ण के समान स्वाभाविक कवच धनी है। वह अपने स्वभाव के इर्द-गिर्द एक प्रकार का आवरण लेकर जन्मी है। उपरान्त बीच में, फिर मानो वह पुनर्जन्म लेकर और एक आवरण लेकर आई है। रात-दिन साथ रहती हुई भी वह इतनी दूर चली गई है कि मानो राजीव से उस दूरी को पार नहीं किया जाता, मानो वह केवल एक माया की रेखा के बाहर बैठकर अतृप्त तृषित मन से इस सूक्ष्म एवं अटल रहस्य से अवगत होने का प्रयत्न कर रहा है, जैसे तारागण प्रत्येक निशा में नींद रहित निर्निमेष नत नयनों से अन्धकार यामिनी के रहस्य से अवगत होने के निष्फल प्रयास में रात्रि बिता दिया करते हैं। इस प्रकार ये दोनों चिरपरिचित संगरहित साथी भिन्न-भिन्न जीव के रूप में बहुत काल तक साथ बने रहे।
एक दिन, बरसात के मौसम में, शुक्ल पक्ष के दशमी की रात्रि को बादल फटे और निशिकर ने दर्शन दिये। निशिकर की ज्योत्स्ना से यामिनी सोती हुई पृथ्वी के सिरहाने बैठी जागरण कर रही थी। उस यामिनी को देखने बिस्तरे से उठकर राजीव भी झरोखे के पास जा बैठा। बरखा और गर्मी के संगम से थके हुए उपवन में से एक प्रकार की सुगन्ध और झींगुरों की झिन्न-झिन्न की ध्वनि कमरे में आकर उसके मनोराज्य में एक प्रकार की अराजकता व्याप्त कर रही थी। राजीव देख रहा था बगीचे के अंधकार में खड़े हुए वृक्षों के उस पार शान्त स्थिर सरोवर मंजे हुए स्वच्छ रजत-थाल के समान चमक रहा है। इंसान ऐसे समय में स्पष्ट तौर पर कुछ भी सोच सकता है या नहीं, बताना कठिन है। पर हां, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि उसका सम्पूर्ण हृदय किसी एक दिशा की ओर प्रवाहित हुआ है, गन्ध-युक्त उपवन के समान ही एक सुगन्ध से पूर्ण उच्छ्वास छोड़ता रहता है। पता नहीं राजीव ने क्या-क्या विचारा? उसे प्रतीत हुआ कि मानो आज उसके पहले के सब नियम टूट गये हैं। आज इस बरसात की रात ने उसके समक्ष अपना मेघों का अवगुंठन हटा डाला है और आज की यह यामिनी पहले की उस महामाया के समान निस्तब्ध शून्य और सुगंभीर हो गई है। होते-होते अकस्मात ऐसा हुआ कि राजीव का ध्यान जीती-जागती पुतली की ओर प्लावित हो गया। स्वान चलित के समान चलकर राजीव ने महामाया के कमरे में प्रवेश किया। महामाया उस समय निन्द्रा लोक की सैर कर रही थी।
राजीव उसकी शैया के पास जाकर खड़ा हो गया। मुंह झुकाकर देखा, महामाया के अवगुंठन-से हीन चेहरे पर चन्द्रज्योत्स्ना आ पड़ी है, लेकिन! हाय! यह क्या? वह चिरपरिचित पुरुष के समान खिला हुआ चेहरा कहां गया? चिताग्नि की शिखा अपनी विकराल लहराती हुई जिह्ना से महामाया के बायें कपोल का थोड़ा-सा सौन्दर्य चाटकर वहां सदैव के लिए अपनी राक्षसी भूख का अमिट चिन्ह छोड़ गई है।
शायद राजीव चौंक पड़ा हो। शायद एक अव्यक्त ध्वनि भी उसके कंठ से मुखरित हो गई होगी। महामाया तत्काल आश्चर्यचकितावस्था में जाग उठी। देखा, सामने राजीव खड़ा है। उसी क्षण वह अवगुंठन खींचकर शैया छोड़कर एकदम उठ खड़ी हुई। राजीव ताड़ गया कि अब उसके सिर पर दामिनी टूटना चाहती है। वह फर्श पर गिर पड़ा; और महामाया के चरणों को स्पर्श कर बोला- मुझे क्षमा करो, महामाया मुझे क्षमा कर दो।
महामाया कुछ उत्तर न देकर, एक पल के लिए भी पीछे की ओर न हटकर, घर से बाहर निकल गई। राजीव के घर फिर वह कभी नहीं, लौटी। उसका कहीं भी पता न चला। इस क्षमाहीन चिर-गमन की क्रोधाग्नि राजीव के सम्पूर्ण जीवन पर सदैव के लिए सुदीर्घ दग्ध-चिन्ह छोड़ गई।

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